- एलएन शीतल
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायिक अधिकारी बनने की आकांक्षा रखने वालों के लिए तीन साल की प्रैक्टिस को अनिवार्य किये जाने पर एक तीखी बहस छिड़ गयी है, खासकर युवा कानूनी पेशेवरों के बीच। जहाँ तीन साल की प्रैक्टिस के निर्णय के जरिये, भविष्य के न्यायाधीशों में न्यायिक डेकोरम को स्थापित करने, उनमें जटिल प्रक्रियात्मक मामलों को हैंडल करने की समझ विकसित करने और उनके दिलोदिमाग में न्याय चाहने वालों तथा अदालती स्टाफ के प्रति सद्भाव पैदा करने का सर्वोच्च न्यायालय का इरादा सराहनीय है, वहीं आलोचकों का तर्क है कि यह ‘निर्णय’ एक प्रतिगामी कदम है, जो न्यायपालिका में उज्ज्वल भविष्य की आकांक्षी प्रतिभाओं के प्रवेश को गंभीर रूप से बाधित करेगा।
न्यायपालिका लोकतंत्र की आधारशिला है, और इसमें सर्वश्रेष्ठ दिमागों को आकर्षित करना सर्वोपरि है। अब समय आ गया है कि सर्वोच्च न्यायालय अपने रुख पर फिर से विचार करे, 23 साल पीछे जाकर नहीं, बल्कि दूरंदेशी समाधानों को अपनाकर जो प्रतिभा का पोषण करते हैं, पहुंच सुनिश्चित करते हैं, और अंततः भारतीय न्यायपालिका को मजबूत करते हैं। आखिरकार, यदि एक 25 वर्षीय सांसद/विधायक 140 करोड़ लोगों के लिए कानून बना सकता है, एक 24 वर्षीय सर्जन जीवन रक्षक ऑपरेशन कर सकता है, और एक 21 वर्षीय IAS अधिकारी न्यायिक और कार्यकारी कर्तव्य निभा सकता है, तो एक नया कानून स्नातक, जिसकी डिग्री की अवधि कई सिविल सेवकों की तुलना में दोगुनी है, एक प्रवेश स्तर का जूनियर डिवीजन सिविल न्यायाधीश क्यों नहीं बन सकता, खासकर जब उनके निर्णय कई अपीलीय स्तरों के अधीन हों? न्यायपालिका का भविष्य उन लोगों को आकर्षित करने पर निर्भर करता है जो सेवा करने की आकांक्षा रखते हैं, न कि उन्हें हतोत्साहित करने पर।
विसंगतियों का इतिहास
तीन साल प्रैक्टिस की अनिवार्यता की यात्रा, न्यायिक दृष्टिकोणों में बदलाव की एक लंबी दास्तान है। सन 1958 में भारत के 14 वें विधि आयोग (LCI) की रिपोर्ट ने शुरू में राज्य-स्तरीय अधीनस्थ न्यायिक परीक्षाओं के लिए तीन से पांच साल के अनुभव की अनिवार्यता का सुझाव दिया था, जबकि साथ ही अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) का प्रस्ताव रखा था, जिसमें कोई पूर्व व्यावहारिक अनुभव नहीं था, इसके बजाय संरचित प्रशिक्षण पर जोर दिया गया था। इसके पीछे तर्क था- सही समय पर शानदार विधि स्नातकों को आकर्षित करना।
हालाँकि, इस दृष्टिकोण को जल्द ही चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ऑल इंडिया जजेज़ एसोसिएशन बनाम भारत संघ 1992 में, सर्वोच्च न्यायालय ने AIJS के लिए LCI की सिफारिश का समर्थन किया। फिर भी, एक साल बाद, ऑल इंडिया जजेज़ एसोसिएशन (II ) बनाम भारत संघ, (1993) में एक समीक्षा याचिका ने इस रुख को उलट दिया, अधीनस्थ न्यायिक सेवाओं के लिए तीन साल की प्रैक्टिस को दृढ़ता से अनिवार्य कर दिया। न्यायालय ने तब तर्क दिया कि “बिना किसी प्रशिक्षण या वकालत की पृष्ठभूमि वाले स्नातकों को न्यायिक अधिकारियों के रूप में भर्ती करना एक सफल प्रयोग साबित नहीं हुआ है।”
ऑल इंडिया जजेज़ एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2002) में, सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति शेट्टी आयोग की रिपोर्ट पर कार्रवाई करते हुए तीन साल प्रैक्टिस की अनिवार्यता को रद्द कर दिया। शेट्टी आयोग ने देखा कि यह शर्त सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को आकर्षित करने में विफल रही थी, क्योंकि मेधावी कानून स्नातक तीन साल तक इंतजार करने को तैयार नहीं थे। उन्हें न्यायिक सेवा अनाकर्षक लगी। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि “अनुभव से पता चला है कि उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा न्यायिक सेवा की ओर आकर्षित नहीं होती है।”
अब, 23 साल बाद, सर्वोच्च न्यायालय एक बार फिर तीन साल के नियम पर लौट आया है। सीजेआई बीआर गवई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ द्वारा दिया गया यह नवीनतम निर्णय, मुख्य रूप से उच्च न्यायालयों के बहुमत के समर्थन पर आधारित है, विशेष रूप से नये स्नातकों की ‘निम्न गुणवत्ता’ या पिछली परीक्षाओं में सफल नये स्नातकों की संख्या के बारे में अनुभवजन्य साक्ष्य प्रस्तुत किये बिना। यह निरंतर चल रही विसंगति ज़्यादातर उम्मीदवारों को अनिश्चितता और निराशा की स्थिति में छोड़ देती है।
भावी न्यायाधीशों के लिए खतरनाक मार्ग
एंटरी लेवल की न्यायिक परीक्षाओं में बैठने के लिए तीन साल की लीगल प्रैक्टिस को फिर से अनिवार्य किये जाने से भावी न्यायाधीशों, विशेष रूप से आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि वालों और महिलाओं के लिए बड़ी बाधाएँ उत्पन्न हो गयी हैं।
मेधावी दिमाग को हतोत्साहित करना
सबसे पहला प्रभाव अकादमिक रूप से शानदार कानून स्नातकों पर पड़ेगा, खासकर राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों और अन्य शीर्ष स्तरीय संस्थानों के स्नातकों पर। इनमें से कई छात्र पर्याप्त वेतन पैकेज के साथ आकर्षक कॉर्पोरेट प्लेसमेंट प्राप्त करते हैं। वे अक्सर अक्सर लाखों रुपये के शिक्षा ऋणों से दबे होते हैं। उनसे तीन साल की लगभग अवैतनिक प्रैक्टिस के लिए तत्काल उच्च-भुगतान वाले अवसरों को छोड़ने की उम्मीद करना व्यर्थ है। वह भी तब, जब न्यायिक भर्तियों के लिए परीक्षाएँ अनियमित होती हैं। यह निर्णय सक्रिय रूप से ‘सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा’ को न्यायिक सेवाओं में आने के विचार को हतोत्साहित करता है।
आर्थिक असमानता और सामाजिक अभिशाप
यह निर्णय आर्थिक रूप से पिछड़े और एससी/एस टी/ओबीसी उम्मीदवारों को बुरी तरह से प्रभावित करता है। इन वर्गों के युवाओं के लिए, तत्काल रोजगार अक्सर एक आवश्यकता होती है, पसंद नहीं। तीन साल तक इंतजार करना, प्रैक्टिस से न्यूनतम या कोई आय नहीं होना, एक विलासिता है; जिसे वे अफ़ोर्ड नहीं कर सकते। यह उन्हें सिविल सेवाओं, सार्वजनिक उपक्रमों या अकैडमिक क्षेत्र की ओर धकेल देगा, जिससे न्यायपालिका के भीतर प्रतिभाओं का टोटा हो जायेगा।
महिला उम्मीदवारों के लिए झटका
हाल के परीक्षा परिणामों के अनुसार, महिलाएं जिला न्यायपालिका का एक महत्वपूर्ण और बढ़ता हुआ हिस्सा हैं। तीन साल की प्रैक्टिस की अनिवार्यता का निर्णय, मातृत्व या पारिवारिक जिम्मेदारियों के लिए संभावित करियर ब्रेक के साथ, अतिरिक्त बाधाएँ जोड़ेगा, जिससे महिलाओं के लिए पात्रता मानदंडों को पूरा करना कठिन हो जाएगा और न्यायपालिका में उनका प्रतिनिधित्व कम हो जायेगा।
युवाओं की ज़िंदगी बर्बाद करने जैसा
एक कानून स्नातक आमतौर पर 23-24 साल की उम्र तक अपनी डिग्री पूरी कर लेता है। तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस को जोड़ने से उनकी पात्रता उम्र बढ़ कर 27-28 साल हो जाती है। यह सिविल सेवा परीक्षाओं के उलट है, जहाँ उम्मीदवार तीन साल के डिग्री के अंतिम वर्ष में प्रतियोगी परीक्षा में शामिल हो सकते हैं। सिविल सेवाओं के विपरीत, न्यायिक सेवा परीक्षा ज़्यादातर राज्यों में नियमित अंतराल पर आयोजित नहीं होती है, जिसका अर्थ है कि एक उम्मीदवार को तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस की शर्त को पूरा करने के बाद भी अतिरिक्त वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है। यह न्यायिक सेवाओं में आने के इच्छुक युवाओं के ज़िंदगी बर्बाद करने जैसा है।
तीन साल प्रैक्टिस की बाध्यता एक मृगमरीचिका है
सर्वोच्च न्यायालय को उम्मीद है कि तीन साल की प्रैक्टिस न्यायिक डैकोरम को स्थापित करेगी, जटिल प्रक्रियात्मक मामलों को हैंडल करने में सहायक होगी और न्याय चाहने वालों तथा अदालती स्टाफ के प्रति सद्भाव को बढ़ावा देगी। हालाँकि, ज़्यादातर जूनियर वकीलों के लिए प्रैक्टिस की जमीनी हकीकत इस आदर्श से बहुत दूर है।
आगे के रास्ते पर फिर से विचार करना
एक समस्याग्रस्त अतीत में लौटने के बजाय, सर्वश्रेष्ठ न्यायिक प्रतिभाओं को आकर्षित करने और पोषित करने के लिए एक अधिक प्रगतिशील दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
अनिवार्य प्रैक्टिस की जगह बढ़ा हुआ प्रशिक्षण
मुख्य मुद्दा भविष्य के न्यायाधीशों की गुणवत्ता है, न कि केवल लीगल प्रैक्टिस के लिए उनके भविष्य को संकटपूर्ण बना देना। समाधान एक मजबूत, व्यापक और अच्छी तरह से संरचित प्रशिक्षण कार्यक्रम में निहित है। नए कानून स्नातकों को, विशेष रूप से मजबूत अकादमिक नींव वाले, सीधे न्यायिक सेवाओं में शामिल किया जा सकता है और फिर उन्हें दो साल या उससे अधिक की एक गहन प्रशिक्षण अवधि से गुज़ारा जाना चाहिए। इस प्रशिक्षण में शामिल होना चाहिए-
* व्यावहारिक न्यायालय अनुभव: वरिष्ठ जिला और सत्र न्यायाधीशों या यहां तक कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के अंडर परिवीक्षाधीन के रूप में सेवा करना।
* वरिष्ठ वकीलों से संबद्धता: एक निश्चित अवधि(जैसे छह महीने) के लिए कानूनी वकालत में व्यावहारिक अंतर्दृष्टि प्राप्त करने के लिए।
* विशेष मॉड्यूल: न्यायालय के शिष्टाचार, न्यायिक नैतिकता, निर्णय लेखन, साक्ष्य की सराहना और विभिन्न मामलों की संवेदनशील हैंडलिंग पर ध्यान केंद्रित करना।
* परामर्श और कौशल विकास: परिपक्वता, सहानुभूति और धैर्य विकसित करने के लिए संरचित कार्यक्रम।
परीक्षा में सुधार
वर्तमान न्यायिक सेवा परीक्षाओं में अक्सर रटने पर जोर दिया जाता है। परीक्षा पैटर्न को शामिल करने के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव की आवश्यकता है:
* परिदृश्य-आधारित प्रश्न: कानूनी सिद्धांतों के व्यावहारिक अनुप्रयोग का आकलन करने के लिए।
* निर्णय लेखन: विश्लेषणात्मक और मसौदा कौशल का मूल्यांकन करने के लिए।
* मौखिक परीक्षा: संचार, तर्क और व्यावहारिक समस्या-समाधान क्षमताओं को मापने के लिए।
जमीनी वास्तविकताओं को समझना
सर्वोच्च न्यायालय को युवा कानूनी पेशेवरों की आर्थिक वास्तविकताओं और आकांक्षाओं को समझना चाहिए। यदि प्रैक्टिस को इतना ही ज़्यादा ज़रूरी समझा जाता है, तो इसे कम करके एक वर्ष कर दिया जाना चाहिए।
नियमित और पारदर्शी भर्ती
हर राज्य में अधीनस्थ न्यायिक परीक्षाएँ प्रतिवर्ष हों, ऐसा सभी उच्च न्यायालयों के लिए बाध्यकारी करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय व्यवस्था करे।
लॉ ग्रेजुएट्स के लिए अंकों की बाध्यता न हो
जिस तरह अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षा में शामिल होने के लिए केवल किसी भी श्रेणी में स्नातक की डिग्री धारण करने वाले हर युवा को पात्र माना जाता है, उसी तरह एंटरी लेवल की न्यायिक परीक्षाओं में शामिल होने के लिए केवल विधि स्नातक होना ही अनिवार्य हो, चाहे उसके कितने भी प्राप्तांक हों।
आइजेएस का गठन हो
अतिरिक्त ज़िला जज स्तर की न्यायिक सेवाओं के लिए ‘भारतीय न्यायिक सेवाओं-IJS’ का गठन अविलंब होना चाहिए।
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