
डिजिटल डेस्क। तीन IVF, दो विफलताएँ, एक सफलता और पति का स्पर्श अब असहनीय लगता है। यह किसी एक महिला की कहानी नहीं है। यह उन हज़ारों स्त्रियों की अनकही व्यथा है जो संतान-सुख के लिए अपने शरीर को बार-बार चिकित्सकीय प्रक्रियाओं से गुज़रने देती हैं और एक दिन पाती हैं कि शरीर और मन दोनों ने मना कर दिया है। न किसी से शिकायत, न कोई स्पष्ट कारण- बस एक गहरी, थकी हुई उदासीनता।
IVF क्या करता है शरीर के साथ?
IVF (इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन) एक जटिल प्रजनन तकनीक है। इसमें महिला को पहले हार्मोन इंजेक्शन दिए जाते हैं ताकि अंडाशय अधिक अंडे उत्पन्न करे। फिर अंडे बाहर निकाले जाते हैं, प्रयोगशाला में निषेचित किए जाते हैं, और भ्रूण को गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है। यह प्रक्रिया न केवल शारीरिक रूप से आक्रामक है, बल्कि हार्मोनल स्तर पर भी शरीर को उसकी प्राकृतिक लय से बाहर कर देती है।
जब यह प्रक्रिया एक बार नहीं, दो-तीन बार दोहराई जाती है और उसमें से कुछ विफल रहते हैं तो शरीर और मन दोनों पर जो प्रभाव पड़ता है, उसे चिकित्सा विज्ञान अभी पूरी तरह नहीं समझ पाया है। लेकिन महिलाएँ इसे जीती हैं।
हार्मोनल असंतुलन: कामेच्छा का मूक हत्यारा
IVF में प्रयुक्त दवाएँ GnRH agonists, FSH इंजेक्शन, प्रोजेस्टेरोन सप्लीमेंट शरीर के प्राकृतिक हार्मोन संतुलन को गहराई से प्रभावित करती हैं।एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरोन के स्तर में तीव्र उतार-चढ़ाव सीधे कामेच्छा को कम करते हैं। एक चक्र के बाद शरीर को स्वाभाविक होने में समय लगता है। दो-तीन चक्रों के बाद यह ‘स्वाभाविकता’ लौटने का मौका ही नहीं मिलता।इसके साथ ही अंडाशय में सूजन, बार-बार के आंतरिक परीक्षण, और egg retrieval की प्रक्रिया के बाद शरीर में एक प्रकार की संवेदनशीलता और दर्द बना रहता है। ऐसे में यौन संपर्क शारीरिक रूप से असहज या पीड़ादायक हो सकता है।
मन का घाव: जो दिखता नहीं
शायद सबसे गहरा प्रभाव मनोवैज्ञानिक है। IVF की बार-बार की विफलता एक प्रकार का ‘ambiguous grief’ है, वह दुख जिसे समाज पहचानता नहीं, जिसके लिए कोई अनुष्ठान नहीं है, कोई सांत्वना का ढाँचा नहीं है। हर विफल चक्र के बाद महिला एक भ्रूण खो देती है, जिसे उसने मन में एक बच्चे के रूप में देखना शुरू कर दिया था।इस अनुभव के बाद यौन संबंध का अर्थ बदल जाता है। जो कभी प्रेम और अंतरंगता का माध्यम था, वह अब ‘प्रजनन प्रयास’ से जुड़ गया है, एक ऐसा प्रयास जो बार-बार विफल हुआ है। मन अनजाने में इस जुड़ाव को अस्वीकार करने लगता है।
शरीर की स्वायत्तता: ‘अब मेरा शरीर सिर्फ मेरा है’
IVF की पूरी प्रक्रिया में महिला का शरीर एक चिकित्सकीय ‘माध्यम’ बन जाता है। डॉक्टर, तकनीशियन, अल्ट्रासाउंड मशीनें, सभी उसके शरीर से गुज़रते हैं, अक्सर बिना किसी भावनात्मक संवेदनशीलता के। तीन चक्रों के बाद शरीर इस ‘आक्रमण’ से इतना परिचित हो जाता है कि वह हर स्पर्श को, चाहे वह पति का क्यों न हो, उसी श्रेणी में रखने लगता है।मनोचिकित्सक इसे ‘body autonomy reclamation’ कहते हैं, शरीर का वह मौन विद्रोह जिसमें वह कहता है: ‘अब मैं किसी के लिए उपकरण नहीं बनूँगा।’ यह उदासीनता, इस दृष्टिकोण से, एक रोग नहीं, एक आत्मरक्षा है।
एक बच्चा है, फिर भी दूरी क्यों?
यह प्रश्न अक्सर आता है, ‘पहले IVF से एक बेटी तो हुई, फिर यह उदासीनता क्यों?’ इसका उत्तर सरल नहीं है। एक सफल IVF के बाद दूसरे प्रयास में शरीर पहले से अधिक थका होता है। बच्चे की देखभाल, नींद की कमी, और postpartum के अवशिष्ट प्रभाव पहले से ही हार्मोनल संतुलन को कमज़ोर कर चुके होते हैं। ऊपर से तीसरे IVF की विफलता एक विशेष प्रकार का दर्द देती है, ‘एक बार हो सकता था, तो अब क्यों नहीं?’ यह अपेक्षा और उसका टूटना दोगुनी पीड़ा बनती है।
पति की भूमिका: दबाव नहीं, उपस्थिति चाहिए
जब पत्नी शारीरिक स्पर्श से परहेज़ करती है, तो पति अक्सर इसे व्यक्तिगत अस्वीकृति के रूप में लेते हैं। यह गलतफहमी दाम्पत्य में और दूरी बना देती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि इस अवस्था में पति को ‘presence’ चाहिए, ‘pressure’ नहीं, बिना किसी अपेक्षा के साथ होना ही सबसे बड़ा उपचार है। दम्पती परामर्श इस अवस्था में केवल यौन जीवन को नहीं, बल्कि पूरे रिश्ते को पुनर्जीवित कर सकती है।
क्या किया जाए?
सबसे पहले- विराम। IVF चक्रों के बीच पर्याप्त अंतर शरीर को हार्मोनल संतुलन पुनः प्राप्त करने का अवसर देता है। स्त्री रोग विशेषज्ञ से हार्मोनल स्तर की जाँच, मनोचिकित्सक से व्यक्तिगत परामर्श, और दम्पती थेरेपी, ये तीनों मिलकर इस स्थिति में सुधार ला सकते हैं। यौन संबंध को ‘परिणाम-केंद्रित’ दृष्टि से देखना बंद करना होगा। भावनात्मक जुड़ाव को प्राथमिकता देनी होगी।
IVF की यह यात्रा केवल एक चिकित्सकीय प्रक्रिया नहीं है, यह एक स्त्री के शरीर, मन और अस्मिता की परीक्षा है। जब शरीर ‘बस’ कहे, तो यह कमज़ोरी नहीं। यह उसकी सबसे गहरी ज़रूरत की आवाज़ है। इस आवाज़ को सुनना, समझना और सम्मान देना। यही असली उपचार की शुरुआत है।



