दुनिया को उपदेश देना हमारा राष्ट्रीय शौक रहा है
डिजिटल डेस्क। आजादी के बाद के कांग्रेस दौर में और अब मोदी के दौर में भी भारत अपनी हैसियत के हिसाब से ही हासिल करता रहा है, लेकिन उसे अपनी ताकत और प्रभाव को लेकर हमेशा एक बड़ा भ्रम रहा है- पहले अपनी नैतिक, दार्शनिक और वैचारिक ताकत को लेकर; और अब अपनी रणनीतिक, आर्थिक ताकत को लेकर.
दुनिया को उपदेश देना हमारा राष्ट्रीय शौक रहा है. यह शौक तब भी था जब हमारी प्रति व्यक्ति आय 92 डॉलर थी (1962 में) और अब भी है जब यह 3,000 डॉलर के करीब है. आत्म-छवि किसी भी देश की ताकत का मुख्य हिस्सा होती है, लेकिन कई दूसरे पहलू भी अहम हैं. पहले हम आर्थिक रूप से कमजोर थे, सैन्य खतरों के दबाव में थे, सोवियत संघ के साथ रणनीतिक रूप से जुड़े थे और लंबे समय तक हमें खाद्य सहायता की जरूरत पड़ी. अगर हम 1956 में हंगरी, 1968 में चेकोस्लोवाकिया और 1978 में कंबोडिया पर सोवियत हमले पर चुप रहे, तो इससे साफ दिखता है कि हमारे पास कितनी रणनीतिक आजादी थी.
दुनिया भर में कई तरह की निर्भरताओं के साथ किसी देश की यही सीमाएं होती हैं. रक्षा के मामले में उसे अमेरिका, रूस, इजराइल, फ्रांस पर निर्भर रहना पड़ता है; ऊर्जा के लिए रूस पर; सस्ती इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए चीन पर; रोजगार के लिए खाड़ी देशों और अमेरिका पर निर्भर रहना पड़ता है. इन निर्भरताओं को देखते हुए भारत की नयी ताकत को लेकर ज्यादा उत्साह नहीं होना चाहिए. यही वजह है कि भारत रूस को यूक्रेन पर खुलकर कुछ नहीं कह सकता, अमेरिका-इजराइल गठजोड़ को ईरान पर नहीं टोक सकता और ईरान से यह सवाल नहीं पूछ सकता कि वह अलग-अलग देशों में उग्रवादी समूहों को समर्थन क्यों देता है? यही वजह है कि भारत को एलएसी पर चीन की गतिविधियों को भी सहना पड़ता है. सभी देशों की तरह भारत भी अपनी ताकत और मौके के हिसाब से फैसले करता है.
लेखक- एलएन शीतल



