हमारी जातियाँ, पहचान और इतिहास: एक संतुलित नज़रिया
डिजिटल डेस्क। भारतीय समाज की संरचना को समझना आसान नहीं है. यहाँ जाति, पेशा, धर्म, राजनीति और इतिहास—सभी एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं. विशेषकर ‘दलित’ और ‘आदिवासी’ समुदायों की स्थिति को लेकर अनेक प्रकार के दृष्टिकोण प्रचलित हैं. कुछ ऐतिहासिक तथ्यों पर, तो कुछ भावनात्मक या वैकल्पिक व्याख्याओं पर आधारित हैं.
• जाति व्यवस्था: प्राचीनता और वास्तविकता
यह तथ्य व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि भारतीय समाज में जाति-आधारित विभाजन अत्यंत प्राचीन है. वैदिक और उत्तरवैदिक साहित्य में वर्ण व्यवस्था के संकेत मिलते हैं, जो समय के साथ कठोर सामाजिक संरचना में परिवर्तित हो गयी. कुछ पेशों, विशेषकर मृत पशुओं से जुड़े कार्य को ‘अपवित्र’ मानकर उनसे जुड़े समुदायों को सामाजिक रूप से नीचे रखा गया. इस प्रकार, यह कहना कि जातीय भेदभाव केवल बाहरी आक्रमणों के बाद उत्पन्न हुआ, ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है.
• संघर्षों में दलित और आदिवासी समुदायों की भूमिका
इतिहास का एक कम चर्चित, लेकिन महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि दलित और आदिवासी समुदाय केवल पीड़ित नहीं थे, बल्कि उन्होंने विभिन्न संघर्षों में सक्रिय भूमिका भी निभायी. अनेक जनजातियों (भील, गोंड, संथाल आदि) ने विदेशी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह किये. 1857 के विद्रोह में भी दलितों-आदिवासियों की भागीदारी रही. यानी, भारत का प्रतिरोध केवल राजाओं और सेनाओं तक सीमित नहीं था; समाज के विविध वर्गों ने उसमें बराबर का योगदान दिया.
• विदेशी आक्रमण और सामाजिक संरचना
यह अहम सवाल है कि क्या विदेशी हमलावरों ने दलितों और आदिवासियों की स्थिति को और खराब किया? इसका उत्तर सरल ‘हाँ’ या ‘ना’ में नहीं दिया जा सकता. मध्यकालीन आक्रमणों से राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक गिरावट आयी. इसका असर स्वाभाविक रूप से समाज के कमजोर वर्गों पर अधिक पड़ा. कुछ मामलों में विद्रोही समुदायों को दबाने के लिए कठोर कदम उठाये गये. लेकिन यह कहना कि केवल ‘खुंदक’ में दलितों को और नीचे गिराया गया, इतिहास को अत्यधिक सरल बना देना होगा.
• औपनिवेशिक शासन और ‘ज़रायमपेशा’ की अवधारणा
आदिवासी समुदायों को ‘ज़रायमपेशा’ (criminal) घोषित करने का तथ्य ब्रिटिश काल से जुड़ा है. 1871 का ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसके तहत कई जनजातियों को जन्मजात अपराधी (Criminal Tribes) घोषित कर दिया गया. यह नीति मूलतः नियंत्रण और प्रशासनिक सुविधा के लिए थी, लेकिन इसके सामाजिक परिणाम अत्यंत गंभीर रहे. आज़ादी के बाद इस कानून को समाप्त कर दिया गया और इन समुदायों को ‘डीनोटिफाइड ट्राइब्स’ कहा गया.
• पहचान का पुनर्निर्माण
समय के साथ दलित समुदायों ने अपनी सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए नयी पहचानें अपनायीं. ‘चमार’ से ‘जाटव’, ‘रविदासिया’, ‘अहिरवार’ जैसे नाम; ‘भंगी’ से ‘वाल्मीकि’; ‘दुसाध’ से ‘पासवान’ आदि. यह प्रक्रिया समाजशास्त्र में ‘संस्कृतिकरण’ या ‘Identity Assertion’ के रूप में जानी जाती है. इसका मकसद है- अपमानजनक छवि से दूरी और सामाजिक सम्मान की प्राप्ति.
• दोहरी पहचान का प्रश्न
आज के भारत में एक दिलचस्प स्थिति उभरती है. कानूनी रूप से व्यक्ति अनुसूचित जाति के रूप में आरक्षण का लाभ लेता है और सामाजिक रूप से वह अधिक सम्मानजनक नाम, गोत्र या उपनाम अपनाता है. यह विरोधाभास नहीं, बल्कि सामाजिक संक्रमण का संकेत है, जहाँ कानून ने तो बराबरी दे दी है, लेकिन सामाजिक मानसिकता अभी भी बहुत धीरे-धीरे बदल रही है.
निष्कर्ष के तौर पर यही कहेंगे कि जाति व्यवस्था और भेदभाव प्राचीन हैं, केवल बाहरी कारणों से उत्पन्न नहीं; दलित और आदिवासी समुदाय केवल शोषित नहीं, बल्कि संघर्षशील भी रहे हैं; औपनिवेशिक नीतियों ने गैरबराबरी को और जटिल बनाया तथा आधुनिक समय में पहचान का पुनर्निर्माण एक स्वाभाविक सामाजिक प्रक्रिया है. भारतीय समाज को समझने के लिए हमें एकतरफा दृष्टिकोण से बचना होगा. ना तो पूरा दोष केवल अतीत के समाज पर डाला जा सकता है, और न ही केवल विदेशी आक्रमणों पर. सच्चाई इन दोनों के बीच, कई परतों में मौजूद है.
लेखक – एलएन शीतल



