फ़्री टू ऑल

Mahadevi Verma Birth Anniversary: संवेदनाओं की स्वर-सरिता को नमन, पढ़िए उनकी खूबसूरत रचनाएं

डिजिटल डेस्क। आज हिंदी साहित्य की महान कवयित्री Mahadevi Verma की जयंती देशभर में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जा रही है। उन्हें हिंदी साहित्य के छायावाद युग की प्रमुख स्तंभों में गिना जाता है। उनकी रचनाओं में करुणा, संवेदना, नारी चेतना और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को हुआ था। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से समाज में नारी की स्थिति, उसके अंतर्मन और उसकी पीड़ा को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी भाषा कोमल, भावपूर्ण और हृदय को छू लेने वाली है। उन्हें “आधुनिक मीरा” के रूप में भी जाना जाता है।

उनके साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। आज भी उनकी रचनाएं पाठकों को भावनाओं की गहराई में ले जाती हैं।

महादेवी वर्मा की प्रसिद्ध शीर्ष 3 कविताएं:

1.
मैं नीर भरी दु:ख की बदली!
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा;

क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक-से जलते

पलकों में निर्झरिणी मचली!
मेरा पग-पग संगीत-भरा,

श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,
नभ के नव रँग बुनते दुकूल,

छाया में मलय-बयार पली!
मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल,

चिंता का भार, बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी

नवजीवन-अंकुर बन निकली!
पथ को न मलिन करता आना,

पद-चिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में

सुख की सिहरन हो अंत खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना;

मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही

उमड़ी कल थी मिट आज चली!
मैं नीर भरी दु:ख की बदली!
——————————————————————

2.

फिर विकल हैं प्राण मेरे!
तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूँ उस ओर क्या है!

जा रहे जिस पंथ से युग कल्प उसका छोर क्या है?
क्यों मुझे प्राचीन बनकर

आज मेरे श्वास घेरे?
सिंधु की निःसीमता पर लघु लहर का लास कैसा?

दीप लघु शिर पर धरे आलोक का आकाश कैसा?
दे रही मेरी चिरंतनता

क्षणों के साथ फेरे!
बिंबग्राहकता कणों को शलभ को चिर साधना दी,

पुलक से नभ भर धरा को कल्पनामय वेदना दी;
मत कहो हे विश्व ‘झूठे

हैं अतुल वरदान तेरे!’
नभ डुबा पाया न अपनी बाढ़ में भी क्षुद्र तारे,

ढूँढ़ने करुणा मृदुल घन चीर कर तूफान हारे;
अंत के तम में बुझे क्यों

आदि के अरमान मेरे!
————————————————

3.
बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ!
नींद थी मेरी अचल निस्पंद कण-कण में,

प्रथम जागृति थी जगत् के प्रथम स्पंदन में;
प्रलय में मेरा पता पदचिह्न जीवन में,

शाप हूँ जो बन गया वरदान बंधन में;
कूल भी हूँ कूलहीन प्रवाहिनी भी हूँ!

नयन में जिसके जलद वह तृषित चातक हूँ;
शलभ जिसके प्राण में वह निठुर दीपक हूँ;

फूल को उर में छिपाए विकल बुलबुल हूँ,
एक होकर दूर तन से छाँह वह चल हूँ,

दूर तुमसे हूँ अखंड सुहागिनी भी हूँ!
आग हूँ जिसके ढुलकते बिंदु हिमजल के,

शून्य हूँ जिसको बिछे हैं पाँवड़े पल के;
पुलक हूँ वह जो पला है कठिन प्रस्तर में,

हूँ वही प्रतिबिंब जो आधार के उर में;
नील घन भी हूँ सुनहली दामिनी भी हूँ!

नाश भी हूँ मैं अनंत विकास का क्रम भी,
त्याग का दिन भी चरम आसक्ति का तम भी;

तार भी, आघात भी, झंकार की गति भी,
पात्र भी, मधु भी, मधुप भी, मधुर विस्मृति भी;

अधर भी हूँ और स्मित की चाँदनी भी हूँ!
——————————————————————

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *