विचार

स्वदेशी न्यायशास्त्र: सीजेई सूर्यकांत ने ऐसा क्या कहा, जिस पर मचा है हंगामा…

एक सराहनीय और दूरदर्शी विचार, गुलामी की अवधारणा से निकलने की कोशिश

डिजिटल डेस्क। अभी हाल ही में ऑक्सफोर्ड में सीजेआई जस्टिस सूर्यकान्त ने कहा कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय केवल विदेशों से आयातित अवधारणाओं पर निर्भर रहने के बजाय स्वदेशी न्यायशास्त्र का विकास कर रहा है.

मेरे विचार में यह एक सराहनीय और दूरदर्शी विचार है. भारत के पास न्यायशास्त्र की एक समृद्ध और सुदीर्घ परम्परा है. यहाँ विधि-चिन्तन की जड़ें हजारों वर्ष गहरी हैं. फिर भी, गुलामी के लम्बे दौर में हमारी इस विरासत को विदेशी शासकों ने सिस्टेमैटिक ढंग से हाशिये पर धकेल दिया और हमने अंग्रेजी Common Law को ही न्याय का एकमात्र मानक मान लिया. स्वदेशी न्यायशास्त्र की माँग, दरअसल, इसी ऐतिहासिक असंतुलन को सुधारने की माँग है.

आश्चर्य की बात यह है कि पश्चिमी सोच के गुलाम इस विचार में किसी षड्यंत्र की गंध खोज रहे हैं. उनके अनुसार ‘स्वदेशी न्यायशास्त्र’ का अर्थ वैश्विक, उदार और मानवीय मूल्यों से विचलन तथा तानाशाही की ओर बढ़ना है. परन्तु यह निष्कर्ष न तो तार्किक है और न ही अनिवार्य. ‘स्वदेशी न्यायशास्त्र’ का अर्थ यह नहीं है कि भारत सार्वभौमिक न्याय सिद्धांतों या मानवाधिकारों से विमुख हो रहा है. इसका आशय केवल इतना है कि भारतीय न्यायपालिका विदेशी मिसालों और सिद्धांतों को यांत्रिक रूप से अपनाने के बजाय भारतीय संविधान, भारतीय समाज की आवश्यकताओं और देश की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक वास्तविकताओं के आलोक में न्याय के सिद्धांतों का विकास करे.

याद रहे कि किसी भी जीवंत न्याय-व्यवस्था का विकास उसके अपने इतिहास, सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक अनुभवों और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर होता है. न्याय के सार्वभौमिक सिद्धांत निस्संदेह महत्त्वपूर्ण हैं, किन्तु उनकी व्याख्या और प्रयोग प्रत्येक समाज की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप ही होते हैं.

वस्तुतः विश्व के सभी विकसित लोकतंत्र अपनी न्यायिक परंपराओं का विकास अपनी परिस्थितियों के अनुरूप करते हैं. कोई भी न्यायपालिका मुख्यतः अपने नागरिकों, अपने संविधान और अपने राष्ट्र के हितों की रक्षा के लिए ही कार्य करती है. इसलिए यदि भारत का सर्वोच्च न्यायालय भारतीय संदर्भों में निहित एक न्यायशास्त्र विकसित करने का प्रयास कर रहा है, तो इसे संदेह की दृष्टि से देखने के बजाय भारतीय न्यायिक चिंतन की स्वाभाविक परिपक्वता के रूप में देखा जाना चाहिए.

अब बात करते हैं उन लोगों की, जो इसमें षड्यंत्र की गंध सूँघ रहे हैं. उनकी आपत्ति का केन्द्रीय तर्क यह है कि स्वदेशीकरण का अर्थ है- वैश्विक मानवाधिकार मानकों से पीछे हटना, और यह किसी तानाशाही एजेंडे की भूमिका तैयार करना है. लेकिन यह तर्क कई स्तरों पर खोखला है.

पहली बात तो यह कि सीजेआई ने यह कहीं नहीं कहा कि अन्तरराष्ट्रीय न्यायशास्त्र को अस्वीकार किया जाये. उन्होंने केवल ‘निर्भरता’ पर प्रश्न उठाया है. दूसरी बात यह कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट अपने संविधान की मूल भावना को सर्वोपरि रखता है. यूरोपीय न्यायालय अपनी परम्पराओं को. तो भारत क्यों नहीं? कोई भी न्यायपालिका अन्ततः अपने नागरिकों और अपने देश के संवैधानिक मूल्यों के लिए ही काम करती है. क्या यह सत्य नहीं? और तीसरी बात यह कि यदि भारतीय सन्दर्भ में न्याय की व्याख्या करना तानाशाही है, तो फिर पश्चिम की हर अवधारणा को आँखें मूँदकर स्वीकार करना क्या है? वह तो बौद्धिक गुलामी है. और क्या गुलामी किसी भी रूप में न्याय की शत्रु नहीं होती?

न्याय सार्वभौमिक सत्य पर अवश्य टिका होता है, लेकिन उस सत्य की अभिव्यक्ति हमेशा किसी न किसी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक भूमि पर होती है. भारतीय भूमि पर उसकी अभिव्यक्ति भारतीय अनुभव से ही होगी, यह स्वाभाविक है. क्या इस पर आपत्ति निरर्थक नहीं?

लेखक: एलएन शीतल

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