स्वामी विवेकानंद की कौन सी बात पर मच रहा बवाल… जानें पूरा सच!
विवेकानंद के नाम पर फ़िज़ा में ज़हर घोलने की साज़िश
डिजिटल डेस्क। अभी सोशल मीडिया पर कई तथाकथित मुस्लिम स्कॉलर यह बकवास कर रहे हैं कि खुद स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि जो गौमांस नहीं खाता, वह सच्चा हिन्दू नहीं है. ये षड्यंत्रकारी एक साजिश के तहत स्वामी जी के कथन को उसके संदर्भ से अलग करके फिज़ा में जहर घोलने की कोशिश कर रहे हैं.
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, “यह जानकर आप चकित हो जायेँगे कि प्राचीन धार्मिक विधि-विधानों के अनुसार, जो व्यक्ति गोमांस नहीं खाता, वह अच्छा हिन्दू नहीं माना जाता था. कुछ विशेष अवसरों पर उसे एक बैल की बलि देनी होती थी और उसका मांस खाना होता था. यह बात आज घृणास्पद लगती है. बहरहाल, भारत में हिन्दू आपस में चाहे जितने भी मतभेद रखते हों, इस एक बात में वे सब एकमत हैं कि वे गोमांस नहीं खाते. प्राचीन यज्ञ-बलियाँ और प्राचीन देवता, ये सब अब भुलाये जा चुके हैं; आधुनिक भारत वेदों के आध्यात्मिक पक्ष का अनुसरण करता है.”
दरअसल स्वामी विवेकानंद अपने समय के हिन्दुओं को बीफ खाने की सलाह नहीं दे रहे थे, बल्कि वे प्राचीन वैदिक और अनुष्ठानिक परंपराओं के इतिहास का उल्लेख कर रहे थे. उसी क्रम में उन्होंने आगे कहा,”एक समय था जब इसी भारत में बिना गोमांस भक्षण के कोई ब्राह्मण, ब्राह्मण नहीं रह सकता था। वेदों में आप पढ़ते हैं कि जब कोई संन्यासी, राजा अथवा महापुरुष किसी के घर आता था, तो सबसे उत्तम बैल का वध किया जाता था, किन्तु कालान्तर में यह अनुभव हुआ कि चूँकि हम एक कृषि-प्रधान जाति हैं, इसलिए श्रेष्ठ बैलों का वध करते रहना वस्तुतः अपनी जाति के विनाश को आमंत्रण देना है. अतः यह प्रथा बन्द कर दी गयी और गोवध के विरुद्ध एक स्वर उठाया गया.” यानी कि उन्होंने यह स्पष्ट किया कि वह प्राचीन प्रथा अब अप्रासंगिक और त्याज्य हो गयी है.
उनका यह उद्धरण उनकी ‘Complete Works, Volume 3’ के निबंध ‘Buddhistic India’ में संकलित है. वह कह रहे थे कि देशकाल और पारिस्थियों के अनुसार प्रथाएँ बदलती हैं. वह हिंदू धर्म के इतिहास को यथार्थवादी दृष्टि से प्रस्तुत कर रहे थे. यह न तो बीफ का समर्थन था, न आधुनिक हिंदुओं को बीफ खाने का आह्वान.
लेखक: एलएन शीतल



