विचार

छात्र आंदोलन, सियासत और सत्ता का अहंकार: असली मुद्दे पर किसने डाली राजनीति की धूल?

छात्र आंदोलन में बाहरी तत्वों की भूमिका, राजनीतिक दलों की सक्रियता और सत्ता के रवैये पर सवाल; युवाओं की वास्तविक पीड़ा कैसे सियासी लाभ-हानि की लड़ाई में दब गई, इसी पर केंद्रित है यह विश्लेषण।

डिजिटल डेस्क। दो राय नहीं कि छात्र आंदोलन में जो देश विरोधी नारे लगे और जो हिंसा हुई, वह सब बाहर के लोगों ने किया. बेचारा वांगचुक खुद कह रहा था कि बाहर के असामाजिक तत्व घुस आये थे आंदोलन में जिन्होंने पत्थर फेंके, हिंसा की. रही सही कसर सियासी गिद्धों और कौओं ने पूरी कर दी. वांगचुक की पत्नी ने भी यही कहा कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री आवास पर जाने का असंवैधानिक कार्य नहीं करना चाहिए था. छात्र आंदोलन में सियासी लाभ लूटने के लिए घाघ और लुटे-पिटे पॉलिटिशियन गिद्धों और कुत्तों की तरह भिड़ गये.

दूसरी तरफ सीजेपी टीम के जो भी लोग हैं, जैसे भी हैं, उनके आंदोलन में लोगों की, बच्चों की पीड़ा तो थी. वो पीड़ा अगर कोई व्यक्त कर रहा था तो सियासी गिद्ध ऐसे भिड़े कि उसको नोच डालने, पूरा का पूरा श्रेय ख़ुद हड़प लेने पर उतारू हो गये. श्रेय लेने की शुरुआत की थी सियासी गिद्ध केजरीवाल ने, क्योंकि इस आंदोलन में उसकी ‘बी’ टीम के लोगों की संख्या बहुत बड़ी थी.

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मगर जब दूसरे गिद्धों ने देखा कि लाभ तो वह अकेला ही लूट ले जायेगा तो उनमें भी होड़ लग गयी. कांग्रेस कूद गयी, तथा कथित समाजवादी कूद गये. वो कूद गये तो वामी भी कूद गये. ये सब भेड़ियों और शिकारी कुत्तों की तरह टूट पड़े लोथड़े खाने के लिए.

अगर केवल लड़के-लड़कियां होते तो उस आंदोलन का बहुत ही दूसरा रूप होता. आंदोलन को बहुत गरिमा और प्रतिष्ठा मिलती.

मैं मानता हूँ कि दिल्ली से लेकर हर प्रदेश तक बीजेपी का जो अहंकार पसरा है, उसका एक बड़ा हाथ रहा है हालात को इस क़दर संगीन बनाने में. इनमें अकल होती और अन्ततः इस्तीफ़ा दिलवाना ही था तो शुरू में ही दिलवा देते. सम्मान रह जाता. यह असल में भाजपा के अहंकार की पराजय है. भाजपाई बाहर से नहीं मरेंगे. ये अपने अंदर के अहंकार से मरेंगे.

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आप देख लो, दिल्ली से लेकर मध्य प्रदेश तक क्या हो रहा है. अब उज्जैन की खबरें आप देखो. जिससे भी बात करो, वही कहता है कि सब जगह लेन-देन चल रहा है. अब शाह साहब की मर्जी हो गयी तो वो भी शाह बने हुए हैं. नकारापन की पराकाष्ठा है.

लेखक: एल एन शीतल

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