न्यायपालिका की साख पर साजिश का आरोप: सात साल बाद भी अनसुलझे सवाल, कार्रवाई कब?
पूर्व CJI रंजन गोगोई को कथित तौर पर फंसाने की साजिश से लेकर विदेशी फंडिंग के आरोपों तक, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता पर उठे सवालों ने जवाबदेही और निर्णायक कार्रवाई की जरूरत को फिर चर्चा में ला दिया है।
डिजिटल डेस्क। हमारी न्यायपालिका की विश्वसनीयता, गरिमा और स्वतंत्रता को कमजोर करने और अंततः उसे ध्वस्त करने की एक सुनियोजित साज़िश वर्षों से चल रही है. एक बड़ी विदेशी ताक़त और उसके भारतीय एजेंटों तथा बिचौलियों का नेटवर्क लंबे समय से इस एजेंडे को आगे बढ़ाने में जुटा हुआ है.
यह बात स्पष्ट कर दूँ कि मैं कोई चंडूखाने की अललटप्पू बात नहीं कर रहा हूँ. इसके पीछे का रिकॉर्ड मौजूद है. उसे देखा और स्वतंत्र रूप से परखा जा सकता है. बल्कि अब तो ऐसे आरोपों को भी नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होता जा रहा है कि इस पूरी साज़िश को बेहिसाब बाहरी फंडिंग हासिल हो रही है.
2019 का साल याद कीजिए. इसी वर्ष एक वकील ने आरोप लगाया था कि न्यायिक व्यवस्था के भीतर ऐसे ‘फिक्सर’ सक्रिय हैं, जो अदालतों में सुनवाई और यहाँ तक कि न्यायिक फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. सिस्टम के भीतर मौजूद कुछ फिक्सरों, कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और कॉरपोरेट जगत से जुड़े कुछ लोगों ने तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई को यौन उत्पीड़न के आरोपों में फँसाकर उन्हें पद से हटाने की साज़िश रची थी क्योंकि CJI गोगोई के सख़्त और बेबाक रवैये से निहित स्वार्थों का एक स्थापित नेटवर्क प्रभावित होने लगा था और इसलिए उन्हें रास्ते से हटाने की कोशिश की गयी.
मामला इतना गंभीर था कि सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने साज़िश तथा न्यायालय की व्यवस्था के भीतर किसी संभावित षड्यंत्रकारी नेटवर्क की मौजूदगी की जाँच का दायित्व सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस एके पटनायक को सौंपा. सीबीआई निदेशक और इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख को जस्टिस पटनायक की सहायता करने का दायित्व दिया गया था.
इस तीन सदस्यीय पीठ की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस अरुण मिश्रा ने तब एक ऐसा सवाल उठाया था, जो पूरे मामले की जड़ पर सीधा प्रहार करता था: “किसी की क्या मज़ाल कि वह न्यायपालिका को नियंत्रित करने की कोशिश करे?” उन्होंने यह भी सवाल उठाया था कि पिछले कुछ समय से इस संस्थान के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है, मानो इसका अस्तित्व ही समाप्त होने वाला हो. क्या ताक़तवर लोग यह समझते हैं कि वे देश की हर संस्था को अपनी मर्ज़ी से चला सकते हैं? हरगिज़ नहीं.
जस्टिस पटनायक ने अपनी रिपोर्ट 18 फरवरी 2021 को सौंपी. रिपोर्ट में कहा गया था कि CJI को फँसाने की साज़िश की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
और उसके बाद क्या हुआ? आंधी थमने के बजाय, न्यायपालिका को लेकर उठने वाले आरोप और उस पर होने वाले हमले लगातार तेज़ होते चले गये. साल-दर-साल स्थिति और अधिक आक्रामक होती गयी.
आज जो आरोप सामने आ रहे हैं, उनके अनुसार न्यायपालिका और कार्यपालिका के सर्वोच्च स्तर पर बैठे लोगों के पास इस बात के पुख़्ता सबूत मौजूद हैं कि उक्त विदेशी ताक़त भारत की न्यायिक व्यवस्था की छवि, विश्वसनीयता और अधिकार को व्यवस्थित ढंग से कमजोर करने के लिए भारी मात्रा में फंडिंग कर रही है.
लेकिन यहाँ सबसे बड़ा और सबसे परेशान करने वाला सवाल खड़ा होता है–अगर देश की सर्वोच्च अदालत और भारत सरकार को लगभग सात वर्ष पहले ही ऐसी किसी साज़िश की जानकारी मिल चुकी थी, तो तब निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? उस नेटवर्क को ध्वस्त क्यों नहीं किया गया? फंडिंग करने वालों और उनके मददगारों को बेनक़ाब क्यों नहीं किया गया? और सबसे महत्वपूर्ण यह कि आज भी सरकार इस मामले में प्रभावी कार्रवाई करने में असमर्थ क्यों दिखायी दे रही है? सात साल बीत चुके हैं. आरोप ख़त्म नहीं हुए. सवाल ख़त्म नहीं हुए. और यदि रिकॉर्ड तथा उसके बाद सामने आये घटनाक्रम वास्तव में उतने गंभीर हैं, जितने ये आरोप संकेत करते हैं, तो अब केवल चुपचाप देखते रहना कोई विकल्प नहीं हो सकता. क्योंकि न्यायपालिका पर हमला केवल एक संस्था पर हमला नहीं है. यह हमारी संवैधानिक बुनियाद पर हमला है.
लेखक: एल एन शीतल



