गांधी जयंती 2026: पोरबंदर के मोहनदास से महात्मा बनने तक का सफर
सत्य, अहिंसा और संघर्ष को हथियार बनाकर एक साधारण वकील कैसे बना जन-जन का नेता
डिजिटल डेस्क। हर साल 2 अक्टूबर को मनाई जाने वाली Gandhi Jayanti केवल एक जन्मदिवस नहीं, बल्कि Truth, Non-Violence and Freedom यानी सत्य, अहिंसा और स्वतंत्रता के उन मूल्यों को याद करने का दिन है, जिनसे महात्मा गांधी ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी। 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी का जीवन एक साधारण बालक से महात्मा बनने की असाधारण यात्रा है।
पोरबंदर से शुरू हुई कहानी
मोहनदास का जन्म करमचंद गांधी और पुतलीबाई के घर हुआ। धार्मिक और संस्कारवान वातावरण में पले गांधी के व्यक्तित्व पर उनकी माता के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। बचपन से ही सत्य, संयम और सेवा उनके जीवन का हिस्सा बनने लगे।
कम उम्र में कस्तूरबा से उनका विवाह हुआ। इसके बाद वर्ष 1888 में वे कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए और 1891 में बैरिस्टर बनकर भारत लौटे।
दक्षिण अफ्रीका ने बदली जिंदगी
भारत में वकालत के शुरुआती प्रयासों के बाद 1893 में गांधी दक्षिण अफ्रीका गए। वहां भारतीयों के साथ होने वाले भेदभाव ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। ट्रेन से बाहर निकाले जाने की घटना उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बनी।
उन्होंने अन्याय के खिलाफ संघर्ष शुरू किया और यहीं Satyagraha तथा अहिंसक आंदोलन के विचार को विकसित किया। दक्षिण अफ्रीका के करीब 21 वर्षों ने उन्हें एक वकील से सामाजिक कार्यकर्ता और जननेता बनने की दिशा दी।
1915 में भारत लौटे गांधी
9 जनवरी 1915 को गांधी भारत लौटे। उन्होंने देश को समझने के लिए व्यापक यात्राएं कीं और किसानों, मजदूरों तथा आम लोगों की समस्याओं से जुड़े। 1917 का Champaran Satyagraha उनके भारतीय सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव बना।
इसके बाद खेड़ा और अहमदाबाद जैसे आंदोलनों ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया। सत्याग्रह और अहिंसा अब उनके संघर्ष की पहचान बन चुके थे।
मोहनदास से ‘महात्मा’ तक
गांधी को ‘महात्मा’ कहे जाने का उल्लेख 1914 के आसपास दक्षिण अफ्रीका से मिलता है। भारत में उनका प्रभाव बढ़ने के साथ यह संबोधन व्यापक रूप से लोकप्रिय हुआ। उन्होंने सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समानता को अपने जीवन का आधार बनाया।
2 अक्टूबर आज उनके जन्मदिवस के साथ-साथ International Day of Non-Violence के रूप में भी याद किया जाता है। पोरबंदर से शुरू हुई मोहनदास की यात्रा यह बताती है कि दृढ़ विचार, आत्मअनुशासन और अहिंसक संघर्ष भी इतिहास की दिशा बदल सकते हैं।



