हम कॉकरोच नहीं हैं… हम जेन ज़ी हैं!
जिस पीढ़ी को 'रील्स वाली' समझा गया, उसने वक्त आने पर सड़कों पर लोकतंत्र का सबसे नया अध्याय लिख दिया
डिजिटल डेस्क। “ये बच्चे बिगड़ गए हैं…” “इनसे देश नहीं चलेगा…” “बस फोन चलाना आता है…” अगर जेन ज़ी का कोई आधिकारिक परिचय लिखा जाए, तो शायद यही तीन वाक्य सबसे ऊपर मिलेंगे। हम वो पीढ़ी हैं, जिसे हर पीढ़ी ने अपने हिसाब से परिभाषित किया। किसी ने हमें “मोबाइल की औलाद” कहा। किसी ने “रील्स की फैक्ट्री”। किसी ने कहा-“इनके पास धैर्य नहीं है।” और कुछ लोगों ने तो हमें मज़ाक में “कॉकरोच” तक कह दिया- कि चाहे जैसा माहौल हो, ये बस अपने में मस्त रहते हैं।
सच कहूं… हमें इससे कभी बहुत फर्क नहीं पड़ा। क्योंकि हम सचमुच अपनी दुनिया में खुश रहने वाले लोग थे। हम दोस्तों के साथ चाय पर बहस कर लेते थे, इंस्टाग्राम पर मीम्स शेयर कर लेते थे, रात के दो बजे तक ऑनलाइन रहते थे और सुबह फिर जिंदगी शुरू कर देते थे। हम किसी के झगड़े में बिना वजह नहीं पड़ते थे। हमें लगता था कि देश चलाने के लिए बड़े लोग हैं! सरकार है! संविधान है! संस्थाएं हैं!
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हमारा काम बस अपने सपनों की तैयारी करना है। हमें भरोसा था। ठीक वैसा भरोसा, जैसा एक बच्चे को अपने पिता पर होता है कि चाहे दुनिया कुछ भी कर ले, पिता उसका हाथ नहीं छोड़ेंगे। लेकिन जिंदगी का सबसे कठिन सबक यही है- भरोसा टूटने की आवाज़ बाहर कम, भीतर ज़्यादा सुनाई देती है।
जब जेन ज़ी सड़क पर उतरी, तब लोगों ने पहली बार उसे समझना शुरू किया। कहते हैं हर पीढ़ी अपना विरोध अपने समय की भाषा में करती है। किसी दौर में इंकलाब अखबारों में छपता था। फिर पोस्टरों पर लिखा गया। फिर दीवारों पर। और अब… वह कैमरे के फ्रंट लेंस में रिकॉर्ड होता है। यही तो जेन ज़ी है। जिसने विरोध भी अपने अंदाज़ में किया।
किसी ने राष्ट्रगान गाया। किसी ने घायल दोस्त को उठाया। किसी ने वीडियो रिकॉर्ड किया ताकि सच बचा रहे। किसी ने मीम बनाया, क्योंकि कभी-कभी व्यंग्य वहां काम करता है, जहां भाषण हार जाते हैं। किसी ने लिखा- “हम ट्रेंड नहीं बना रहे… हम चाहते हैं कि हमारी बात सुनी जाए।”
हमारी सबसे बड़ी ताकत- हम हंसना नहीं छोड़ते… जेन ज़ी का सबसे गलत आकलन यही हुआ कि लोगों ने हमारी हंसी को हमारी कमजोरी समझ लिया। अरे साहब… हम इसलिए हंसते हैं क्योंकि अगर हर बात पर रोने लगें, तो शायद जी ही न पाएं। हम मीम बनाते हैं।लेकिन दर्द का मज़ाक नहीं उड़ाते। हम रील बनाते हैं। लेकिन ज़रूरत पड़ने पर कैमरा गवाह भी बना देते हैं। हम ट्रोलिंग का जवाब पंचलाइन से देते हैं और अन्याय का जवाब सवालों से। यही हमारी भाषा है। इसे हल्के में मत लीजिए।
और फिर आईं लड़कियां… जिन्होंने पूरी कहानी बदल दी। इस पूरी तस्वीर का सबसे प्रेरक हिस्सा थीं देश की बेटियां। वे सिर्फ भीड़ का हिस्सा नहीं थीं। वे कई जगह भीड़ का साहस थीं। जहां साथियों को सहारे की ज़रूरत थी, वहां उन्होंने कंधा दिया। जहां आवाज़ कम पड़ रही थी, वहां उन्होंने नारे बुलंद किए। जहां डर दिख रहा था, वहां उन्होंने मुस्कुराकर कहा- “डरना बाद में… पहले साथ खड़े होते हैं।” उनकी आंखों में गुस्सा भी था। आंसू भी। लेकिन सबसे ज़्यादा था- अपने साथियों के लिए अपनापन। इतिहास जब भी इस दौर की तस्वीर बनाएगा, उसमें लड़कियां पीछे खड़ी हुई नहीं दिखेंगी। वे सबसे आगे दिखाई देंगी।
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हम सवाल पूछते हैं, क्योंकि हमें उम्मीद अभी भी है। अगर हमें इस देश से प्यार न होता… तो शायद हम सवाल भी न पूछते। उदासीन लोग आंदोलन नहीं करते। वे बस आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन जो उम्मीद रखते हैं… वही जवाब मांगते हैं। हमारी पीढ़ी का गुस्सा नफरत से नहीं, उम्मीद से पैदा होता है। हमें आज भी अपने देश से प्यार है। आज भी अपने संविधान पर भरोसा है। और शायद इसी वजह से हम चाहते हैं कि हर संस्था, हर व्यवस्था और हर जिम्मेदार व्यक्ति उस भरोसे पर खरा उतरे।
इतिहास शायद हमें ‘मोबाइल वाली पीढ़ी’ नहीं कहेगा। शायद आने वाले समय में लोग हमें किसी और नाम से याद करेंगे। वह पीढ़ी… जो मीम भी बना सकती थी और मोर्चा भी संभाल सकती थी। जो कैमरा भी उठा सकती थी और घायल दोस्त का हाथ भी। जो हंसते-हंसते सबसे कठिन दिनों से गुजर सकती थी। जो ट्रेंड भी बना सकती थी और सवाल भी।
और जिसने दुनिया को बता दिया- जेन ज़ी को समझना है, तो उसके फोन की स्क्रीन मत देखिए…
उसकी आंखों में पल रहे सपनों, उसके टूटे भरोसे और उसके भीतर बची उम्मीद को देखिए। क्योंकि… हम कॉकरोच नहीं हैं। हम वो पीढ़ी हैं, जो राख से भी उठना जानती है। हम जेन ज़ी हैं और हमें अब सिर्फ देखा नहीं जाएगा, सुना भी जाएगा।
लेखक: नन्दिनी राजोरिया



