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मध्यप्रदेश की मिट्टी का दुनिया ने माना लोहा: एक साथ 16 उद्यानिकी उत्पादों को मिला GI टैग

देश में पहली बार इतनी बड़ी उपलब्धि, गुना के धनिया से लेकर आलीराजपुर के नूरजहां आम तक को मिली वैश्विक पहचान | वर्ष 2030 तक 30 लाख हेक्टेयर में होगा उद्यानिकी फसलों का विस्तार

डिजिटल डेस्क। मध्यप्रदेश ने कृषि और उद्यानिकी के क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। प्रदेश के 16 विशिष्ट उद्यानिकी उत्पादों को एक साथ भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त हुआ है। यह देश में अपनी तरह की पहली उपलब्धि है, जिसने मध्यप्रदेश को विशिष्ट कृषि उत्पादों के मानचित्र पर नई पहचान दिलाई है। इस उपलब्धि से प्रदेश के किसानों के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के नए द्वार खुलेंगे, वहीं स्थानीय उत्पादों को वैश्विक ब्रांड के रूप में पहचान मिलेगी।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसे कृषक कल्याण वर्ष की बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि प्रदेश सरकार किसानों की आय बढ़ाने के लिए उद्यानिकी फसलों को लगातार प्रोत्साहित कर रही है। वर्तमान में प्रदेश में लगभग 28 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में उद्यानिकी फसलों की खेती हो रही है, जिसे वर्ष 2030 तक 30 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया है।

इन उत्पादों को मिली विशिष्ट पहचान

GI टैग प्राप्त करने वाले प्रमुख उत्पादों में गुना का कुम्भराज धनिया, नरसिंहपुर के बरमान घाट का भटा (बैंगन), बैतूल का गजरिया आम, खरगोन की लाल मिर्च, मांडू की खुरासानी इमली, जबलपुर की हरी मटर, सिवनी का जंबो सीताफल, मालवी आलू, मालवा का गराड़ू, नरसिंहपुर का गुड़, जबलपुर का सिंघाड़ा, आलीराजपुर का नूरजहां आम, बुरहानपुर का केला, इंदौरी जीरावन, रतलाम-सैलाना की बालम ककड़ी और छतरपुर का पान शामिल हैं।

इसके अलावा उज्जैन की इमली, आलीराजपुर का अचारी आम, मालवा का सफेद प्याज, झाबुआ का दाल पानिया, मंदसौर का देशी जीरा, बुरहानपुर की जलेबी और अशोकनगर की खिरनी के लिए भी GI टैग का प्रस्ताव भेजा गया है।

क्यों खास है कुम्भराज धनिया?

गुना जिले का कुम्भराज धनिया लगभग 60 वर्षों से अपनी विशेष गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है। इसकी तीखी सुगंध, प्राकृतिक मिठास और अधिक वाष्पशील तेल इसे अन्य किस्मों से अलग बनाते हैं। यह मात्र 85 से 90 दिनों में तैयार हो जाता है और प्रति हेक्टेयर 12 से 15 क्विंटल तक उत्पादन देता है। अकेला गुना जिला देश के कुल धनिया उत्पादन का लगभग 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा देता है।

नर्मदा किनारे का अनोखा स्वाद

नरसिंहपुर के बरमान घाट का बैंगन अपनी अलग बनावट और स्वाद के लिए प्रसिद्ध है। नर्मदा नदी की रेतीली मिट्टी और अनुकूल जलवायु इसके स्वाद को विशेष बनाती है। यही वजह है कि प्रदेश के बाहर भी इसकी अच्छी मांग रहती है।

बैतूल का गजरिया आम

गोंड संस्कृति की ऐतिहासिक धरती बैतूल का गजरिया आम स्वाद और सुगंध के लिए जाना जाता है। इससे अचार, अमचूर, जूस, जैम और कई प्रसंस्कृत उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इसकी गुणवत्ता इसे प्रदेश की विशिष्ट आम किस्मों में शामिल करती है।

दुनिया तक पहुंची निमाड़ की लाल मिर्च

खरगोन जिले की लाल मिर्च अपने गहरे रंग और तीखे स्वाद के कारण देश ही नहीं, विदेशों में भी पहचान बना चुकी है। चीन, मलेशिया, पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

मांडू की पहचान बनी खुरासानी इमली

मांडू की ऐतिहासिक धरोहरों के बीच खड़ा सदियों पुराना बाओबाब वृक्ष, जिसे खुरासानी इमली कहा जाता है, इतिहास और प्रकृति का अद्भुत संगम है। माना जाता है कि इसे 14वीं शताब्दी में अफ्रीका से मांडू लाया गया था।

जंबो सीताफल और विशाल नूरजहां आम

सिवनी का जंबो सीताफल अपने 600 से 700 ग्राम तक के वजन के कारण खास पहचान रखता है। वहीं आलीराजपुर का नूरजहां आम दुनिया के सबसे बड़े आमों में गिना जाता है, जिसका वजन तीन से साढ़े तीन किलोग्राम तक पहुंच जाता है।

मालवा का स्वाद भी हुआ सम्मानित

मालवी आलू, गराड़ू और इंदौरी जीरावन जैसे उत्पाद केवल कृषि उपज नहीं, बल्कि मालवा की संस्कृति और स्वाद की पहचान हैं। वहीं नरसिंहपुर का गुड़, जबलपुर का सिंघाड़ा, बुरहानपुर का केला और छतरपुर का पान भी अपनी विशिष्ट गुणवत्ता के कारण अब वैश्विक पहचान हासिल करेंगे।

किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है GI टैग?

GI टैग मिलने से उत्पादों की ब्रांड वैल्यू बढ़ती है, नकली उत्पादों पर रोक लगती है और किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिलता है। इससे निर्यात के अवसर बढ़ते हैं और स्थानीय उत्पाद वैश्विक बाजार में अपनी अलग पहचान बनाते हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं।

मध्यप्रदेश बनेगा उद्यानिकी उत्पादों का वैश्विक ब्रांड

एक साथ इतने उत्पादों को GI टैग मिलना केवल सम्मान नहीं, बल्कि प्रदेश की समृद्ध कृषि परंपरा, जैव विविधता और किसानों की मेहनत का वैश्विक प्रमाण है। आने वाले वर्षों में यह उपलब्धि न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करेगी, बल्कि “ब्रांड मध्यप्रदेश” को अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई ऊंचाई भी प्रदान करेगी।

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