Protest Politics: मुद्दा सही, लेकिन राजनीति ने कमजोर किया आंदोलन
पेपर लीक पर युवाओं का आक्रोश जायज़, लेकिन हिंसा, राजनीतिक दखल और मूल मुद्दे से भटकाव ने आंदोलन की नैतिक ताकत को कमजोर कर दिया।
डिजिटल डेस्क। 20 जुलाई की घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया कि यह विरोध केवल पेपर लीक (PaperLeak) तक सीमित नहीं रह गया था. सरकार से असंतुष्ट अनेक समूह इसमें शामिल हो गये. मुद्दा सही था, पर आन्दोलन धीरे-धीरे अपनी नैतिक विश्वसनीयता खोता गया. जहाँ पुलिस को उकसाने, हिंसा भड़काने और टकराव पैदा करने की कोशिशें दिखें, वहाँ आन्दोलन का चरित्र स्वतः प्रश्नों के घेरे में आ जाता है. जब आन्दोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है, तो सबसे बड़ी हार उसी मुद्दे की होती है जिसके नाम पर वह शुरू हुआ था.
अन्ना आन्दोलन और इस आन्दोलन के बीच सबसे बड़ा अंतर नेतृत्व का था. अन्ना के आन्दोलन पर निजी राजनीतिक स्वार्थ का आरोप नहीं था, जबकि यहाँ मंच पर दिखने वाले ज़्यादातर चेहरे किसी न किसी राजनीतिक उद्देश्य से जुड़े दिखायी दिये. परिणाम यह हुआ कि पेपर लीक और युवाओं के भविष्य जैसे मूल प्रश्न पीछे छूटते गये, जबकि सत्ता परिवर्तन, राजनीतिक नारों और वैचारिक टकराव ने केन्द्र स्थान ले लिया. किसी एक मन्त्री के इस्तीफ़े की माँग से शुरू हुआ आन्दोलन धीरे-धीरे कहीं और पहुँच गया.
लेकिन सारी जिम्मेदारी आन्दोलन पर डालकर सत्ता भी मुक्त नहीं हो सकती. जन-असंतोष को समय रहते सुनना लोकतंत्र का दायित्व है. पेपर लीक पर सरकार ने पहले की तुलना में तेज़ कार्रवाई अवश्य की, पर संवाद और संवेदनशीलता की कमी ने असंतोष को बढ़ने दिया. भाजपा की यह प्रवृत्ति कि आन्दोलन को अनदेखा करो, लोग स्वयं थक जाएँगे, तात्कालिक लाभ दे सकती है, पर दीर्घकाल में राजनीतिक नुकसान का कारण बनती है. किसानों और युवाओं के प्रश्नों पर यही रवैया सबसे अधिक दिखायी देता है.
मैं आन्दोलनों का विरोधी नहीं, लेकिन आँख मूँदकर समर्थन करने का भी पक्षधर नहीं हूँ. इतिहास बताता है कि कई बार वास्तविक जन-पीड़ा का उपयोग राजनीतिक हित साधने के लिए किया जाता है. नक्सलबाड़ी आन्दोलन इसका उदाहरण है, जहाँ सबसे बड़ी कीमत साधारण परिवारों के युवाओं ने चुकायी, जबकि नेतृत्व का एक हिस्सा अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा. इसलिए किसी भी आन्दोलन में शामिल होने से पहले उसकी दिशा, नेतृत्व और उद्देश्य को समझना आवश्यक है. लोकतंत्र (Democracy) में आन्दोलन का अधिकार निर्विवाद है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी शक्ति अहिंसा, नैतिक विश्वसनीयता और मूल मुद्दे पर अडिग बने रहने में है.
लेखक: एल एन शीतल



