विचार

Satluj Film Controversy: अभिव्यक्ति की सीमा और इतिहास की जिम्मेदारी

लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान आवश्यक है, लेकिन आतंकवाद और अलगाववाद जैसे संवेदनशील अध्यायों का संतुलित चित्रण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

डिजिटल डेस्क। आज तक भारत के विरुद्ध कोई अलगाववादी आंदोलन सफल नहीं हुआ है. इसका क्रेडिट राज्य की दृढ़ प्रतिक्रिया को भी जाता है. फिल्म ‘सतलुज’ से जुड़े विवाद (Satluj Film Controversy) को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए. कलात्मक स्वतंत्रता (freedom of expression) में यह अधिकार बिल्कुल शामिल नहीं कि ‘स्वतंत्र भारत के सबसे रक्तरंजित आतंकी आंदोलनों में से एक’ के इतिहास का अत्यंत सिलेक्टिव संस्करण प्रस्तुत किया जाये. दूसरी तरफ, राज्य के पास सार्वजनिक व्यवस्था तथा देश की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा के लिए यह अधिकार है कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ‘सतलुज’ जैसे किसी भी प्रयास को रोके.

पंजाब का आतंकवाद (Punjab terrorism) एक सशस्त्र अलगाववादी आंदोलन था, जिसका उद्देश्य भारत को तोड़ना था. आईएसआई ने पंजाब में आतंकवादी गिरोहों को प्रशिक्षण, हथियार और धन उपलब्ध कराया. समय के साथ कई आतंकवादी गिरोह आपराधिक गिरोहों में बदल गये. पूरा पंजाब आतंकवादी गिरोहों के आतंक की गिरफ्त में था. हालात अकल्पनीय हद तक बदतर थे. लगता था कि पंजाब देश से कभी भी कट सकता है. देश एक असाधारण परिस्थिति का सामना कर रहा था. उसका मुकाबला शांतिपूर्ण राजनीतिक असहमति या संवैधानिक विरोध से नहीं, बल्कि ऐसे संगठित सशस्त्र गिरोहों से था, जो आतंक के माध्यम से संवैधानिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए कमर कसे हुए थे.

ऐसे में किसी फिल्म में इतिहास के सिलेक्टिव चित्रण पर सवाल उठाये जाने को गलत नहीं कहा जा सकता. यदि कोई फिल्म राज्यसत्ता की कथित ज्यादतियों पर ही ध्यान केंद्रित करती है और सशस्त्र उग्रवादियों के सुनियोजित आतंकी अभियान को लगभग पूरी तरह नजरअंदाज कर देती है, तो वह इतिहास का विकृत चित्र प्रस्तुत करती है, जिसका उद्देश्य निरपेक्ष व्याख्या करना नहीं, बल्कि उकसाना होता है.

बेशक, हर गैरकानूनी हत्या की निष्पक्ष जांच होनी ही चाहिए. लेकिन असाधारण आतंकी साज़िशों से निपटने के लिए कई बार अत्यंत कठिन ऑपरेशनल निर्णय लेने पड़ते हैं. ब्रिटेन के आईआरए के खिलाफ अभियान से लेकर स्पेन के ईटीए के विरुद्ध संघर्ष और श्रीलंका के लिट्टे के खिलाफ युद्ध तक, सभी लोकतांत्रिक देशों ने ऐसे द्वंद्वों का सामना किया है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी निरपेक्ष या बेशर्त अधिकार नहीं है. इस लिए सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 की धारा 5 के अंतर्गत सार्वजनिक व्यवस्था तथा देश की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा के लिए फ़िल्म पर रोक की कार्रवाई को ग़लत नहीं कहा जा सकता.

लेखक: एल एन शीतल

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *