विचार

वांगचुक का आमरण अनशन: गाल बजाने के अलावा विपक्ष कर क्या रहा?

किसी आंदोलन के लिए व्यापक सहानुभूति होना और उसी समर्थन का चुनावी वोट में बदल जाना, दो अलग बातें होती हैं.

डिजिटल डेस्क। इरोम चानू शर्मिला को कौन नहीं जानता? उन्हें ‘आयरन लेडी ऑफ मणिपुर’ कहा जाता है. उन्होंने 2 नवम्बर 2000 को मणिपुर के मालोम हत्याकांड के बाद AFSPA (Armed Forces Special Powers Act) को हटाने की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया. वह अनशन 9 अगस्त 2016 तक चला. लगभग 16 वर्ष अर्थात 5,757 दिन.

2016 में अनशन समाप्त करने के बाद उन्होंने राजनीति के जरिये संघर्ष जारी रखने का निर्णय लिया. उन्होंने People’s Resurgence and Justice Alliance (PRJA) नामक पार्टी बनायी. 2017 के मणिपुर विधानसभा चुनाव में उन्होंने थौबल सीट से चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें केवल 90 वोट मिले. NOTA से भी कम. फिर उन्होंने सक्रिय राजनीति छोड़ने की घोषणा कर दी. सत्ता को उनके लम्बे आंदोलन से रत्ती भर भी फ़र्क नहीं पड़ा.

ज़रा ग़ौर कीजिए. एक ओर उनका 16 वर्ष का अहिंसक संघर्ष, और दूसरी ओर चुनाव में सिर्फ 90 वोट मिलना. इससे जाहिर है कि किसी आंदोलन के लिए व्यापक सहानुभूति होना और उसी समर्थन का चुनावी वोट में बदल जाना, दो अलग बातें होती हैं.

इससे इतर, विश्व विख्यात पर्यावरणविद, IIT कानपुर के प्रोफेसरऔर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सदस्य-सचिव रहे प्रो. जीडी अग्रवाल थे, जो बाद में संन्यास लेकर स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद कहलाये. उनका आंदोलन मुख्यतः गंगा और उसकी सहायक नदियों पर बनने वाले बाँधों के विरोध में था. उनका कहना था कि गंगा का अविरल प्रवाह बना रहना चाहिए और अंधाधुंध बाँध नदी की पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुँचाते हैं. 11 अक्टूबर 2018 को अनशन के 111 वें दिन उनका निधन हो गया. उस महामानव के लम्बे आंदोलन और प्राणोत्सर्ग से भी सत्ता को रत्ती भर फ़र्क नहीं पड़ा. सत्ता होती ही ऐसी है!

इसी सन्दर्भ में सोनम वांगचुक के आमरण अनशन को लीजिए. मैं इस विवाद में नहीं पड़ना चाहता कि आमरण अनशन के लिए उनका मुद्दा जेनुइन है या नहीं. बात सिर्फ़ ये कि विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ और वांगचुक के समर्थन में गाल बजाने के सिवाय क्या कर रहा है? विपक्षी पार्टियां इतना भी नहीं कर पा रहीं कि हर पार्टी के दो-दो नेता वांगचुक के समर्थन में एक-एक दिन के क्रमिक अनशन पर बैठ जाते.

लेखक: एल एन शीतल

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