डिजिटल डेस्क। “गणपति बप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया…” ढोल-नगाड़ों की गूंज, फूलों से सजे पंडाल, मोदक की खुशबू और घर-घर गूंजते गणेश मंत्र… गणेश चतुर्थी आते ही वातावरण भक्तिमय हो जाता है। भगवान गणेश को हिंदू परंपरा में विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता, बुद्धि और विवेक के देवता माना गया है। यही कारण है कि किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेशजी का स्मरण और पूजन किया जाता है।
2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर, सोमवार को है। इस दिन गणपति प्रतिमा की स्थापना और मध्याह्न में पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। अनंत चतुर्दशी के दिन, 25 सितंबर को गणपति विसर्जन के साथ उत्सव का समापन होगा।
क्यों मनाई जाती है गणेश चतुर्थी?
गणेश चतुर्थी को भगवान गणेश के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को माता पार्वती ने गणेशजी को उत्पन्न किया था। इसी वजह से इस तिथि को गणेश जन्मोत्सव के रूप में मनाने की परंपरा है। (Drik Panchang)
भगवान गणेश के जन्म की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण डाल दिए। यही बालक गणेश कहलाए। माता पार्वती ने गणेशजी को आदेश दिया कि जब तक वह स्नान करके वापस न आएं, तब तक किसी को अंदर प्रवेश न करने दें। इसी दौरान भगवान शिव वहां पहुंचे। गणेशजी ने उन्हें भी अंदर जाने से रोक दिया।
इस बात से भगवान शिव और गणेशजी के बीच संघर्ष हुआ। क्रोधित होकर भगवान शिव ने गणेशजी का मस्तक काट दिया। माता पार्वती को जब यह पता चला तो वह अत्यंत क्रोधित हुईं और उन्होंने गणेशजी को पुनर्जीवित करने की मांग की। तब भगवान शिव ने गणेशजी के धड़ पर हाथी का मस्तक लगाकर उन्हें नया जीवन दिया। इसके बाद उन्होंने गणेशजी को अपना पुत्र स्वीकार करते हुए उन्हें प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य, पूजा, यज्ञ या धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत श्रीगणेश से करने की परंपरा है।
गणेशजी को क्यों कहा जाता है विघ्नहर्ता?
भगवान गणेश के अनेक नाम हैं—गणपति, गणनायक, गजानन, एकदंत, लंबोदर, विनायक और विघ्नहर्ता। इनमें ‘विघ्नहर्ता’ का अर्थ है बाधाओं को दूर करने वाला। धार्मिक आस्था के अनुसार गणेशजी की पूजा करने से व्यक्ति को बुद्धि, विवेक और शुभता का आशीर्वाद मिलता है। उनका बड़ा सिर ज्ञान और सोच का, बड़े कान अधिक सुनने का, छोटी आंखें एकाग्रता का और सूंड परिस्थितियों के अनुसार ढलने की क्षमता का प्रतीक मानी जाती है।
घर में गणेश प्रतिमा की स्थापना कैसे करें?
गणेश चतुर्थी के दिन घर की साफ-सफाई के बाद पूजा स्थल तैयार करें। चौकी पर स्वच्छ लाल या पीला कपड़ा बिछाकर गणेशजी की प्रतिमा स्थापित की जाती है।
स्थापना के लिए सामान्य रूप से यह क्रम रखा जा सकता है—
- पूजा स्थल और घर की साफ-सफाई करें।
- चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाएं।
- उस पर गणेशजी की प्रतिमा स्थापित करें।
- दीपक जलाकर पूजा का संकल्प लें।
- गणेशजी का आवाहन और प्रतिष्ठापन करें।
- जल, पंचामृत या उपलब्ध परंपरागत सामग्री से स्नान कराएं।
- वस्त्र, जनेऊ, चंदन और अक्षत अर्पित करें।
- फूल और दूर्वा चढ़ाएं।
- गणेशजी को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं।
- धूप-दीप दिखाकर गणेश आरती करें।
- परिवार के सभी सदस्य गणेश मंत्र का जाप करें।
गणेश चतुर्थी पर पारंपरिक रूप से षोडशोपचार पूजा का भी विधान बताया गया है, जिसमें भगवान को विभिन्न 16 प्रकार के उपचार अर्पित किए जाते हैं।
गणेशजी को क्या चढ़ाएं?
गणपति पूजन में दूर्वा और मोदक का विशेष महत्व माना जाता है। इसके अलावा फूल, चंदन, अक्षत, धूप, दीप, फल और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं।
प्रमुख पूजन सामग्री: गणेशजी की प्रतिमा, लाल/पीला वस्त्र, रोली और चंदन, अक्षत, दूर्वा, फूल, धूप और दीप, कपूर, फल, नारियल, मोदक/लड्डू, पंचामृत, कलश और जल
पूजा में बोलें यह सरल मंत्र
पूजा के दौरान श्रद्धालु “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप कर सकते हैं। यह गणेशजी का अत्यंत लोकप्रिय मंत्र है और पूजा के दौरान इसका जाप किया जाता है।
गणेशजी को मोदक क्यों प्रिय हैं?
मोदक को भगवान गणेश का प्रिय भोग माना जाता है। मोदक का बाहरी आवरण और भीतर की मिठास जीवन के एक सुंदर संदेश से भी जोड़ी जाती है— बाहर से कठिन परिश्रम और भीतर से ज्ञान एवं आनंद। इसीलिए गणेश चतुर्थी पर घरों में मोदक बनाए जाते हैं और उन्हें गणपति को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है।
गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा देखने से क्यों मना किया जाता है?
धार्मिक मान्यता में गणेश चतुर्थी की रात चंद्र दर्शन से बचने की परंपरा है। कथा के अनुसार चंद्रमा ने गणेशजी का उपहास किया था, जिसके बाद गणेशजी ने उसे श्राप दिया। बाद में इस श्राप के प्रभाव को सीमित किया गया। इसी से इस दिन चंद्र दर्शन को मिथ्या दोष से जोड़ा जाता है।
गणपति विसर्जन का क्या संदेश है?
गणेश चतुर्थी के बाद प्रतिमा को घर में निर्धारित अवधि तक पूजने के बाद विसर्जन किया जाता है। यह केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि जीवन के एक गहरे दर्शन का प्रतीक भी माना जाता है—आगमन के साथ विदाई निश्चित है और रूप बदलता है, लेकिन आस्था बनी रहती है।



