अधर्म और अन्याय पर विजय का प्रतीक दशहरा, गांधी और शास्त्री जी ने भी दिया था यही संदेश
आत्ममंथन और नयी शुरुआत का अवसर है विजयादशमी का पर्व

डिजिटल डेस्क। रावण हर युग में बदलता है कभी अहंकार, कभी लालच, कभी नफ़रत। आज का दशहरा हमें याद दिलाता है कि असली जीत दूसरों पर नहीं, बल्कि अपनी बुरी आदतों और नकारात्मक सोच पर है। पुतले जलाना आसान है, पर असली दशहरा तब है जब हम अपने भीतर के ‘रावण’ को ख़तम करें।
यही बात महात्मा गांधी ने अपने सत्य और अहिंसा के प्रयोगों से हमें दिखाई। उन्होंने दुनिया को बताया कि बिना हिंसा के भी अधर्म और अन्याय पर विजय पाई जा सकती है।
लाल बहादुर शास्त्री जी ने भी ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा देकर यह सिखाया कि देश की असली ताक़त मेहनत, सादगी और एकता में है।
अगर देखा जाए तो दशहरा, गांधी जयंती और शास्त्री जयंती – तीनों एक ही संदेश देते हैं
* भीतर के अहंकार और बुराई पर जीत,
* सत्य और सादगी की राह पर चलना,
* और समाज को सकारात्मक दिशा देना।
दशहरा केवल राम-रावण की कथा तक सीमित नहीं है। यह हमें याद दिलाता है कि हर युग में बुराई का रूप बदलता है। पहले रावण सोने की लंका का राजा था, आज रावण लालच, भ्रष्टाचार, नफ़रत, प्रदूषण और डिजिटल युग की नकारात्मकता के रूप में हमारे आसपास खड़ा है।
जब हम दशहरे पर रावण का पुतला जलाते हैं, तो यह सिर्फ़ परंपरा नहीं, बल्कि एक प्रतीक है कि हमें अपने भीतर और समाज में मौजूद इन ‘आधुनिक रावणों’ को जलाना है। विजयादशमी का असली अर्थ है – खुद पर विजय पाना, बुरी आदतों को छोड़ना और नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ना।
आज के समय में दशहरा हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि असली जीत वही है, जब हम तकनीक का इस्तेमाल भलाई के लिए करें, रिश्तों में विश्वास बनाएँ और अपने जीवन को संतुलित और सकारात्मक बनाएँ। इसीलिए दशहरा सिर्फ़ उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन और नयी शुरुआत का अवसर है।



