उदयभानु हंस: पढ़िए उनकी कुछ खूबसूरत गज़लें…
डिजिटल डेस्क। उदय भानु का जन्म 2 अगस्त 1926 को पाकिस्तान के मुजफ्फरगढ़ जिले के दायरा दीन पनाह में हुआ था। 1947 में भारत के विभाजन के बाद उनका परिवार हिसार आ गया जब वह 22 साल के थे। उन्होंने हिंदी भाषा में कला में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की और शिक्षक के रूप में शामिल हो गए। वह सरकारी कॉलेज, हिसार के प्रिंसिपल के रूप में सेवानिवृत्त हुए और हिसार में रहते थे। वह चंडीगढ़ साहित्य अकादमी के सचिव भी थे और हरियाणा साहित्य अकादमी की सलाहकार समिति के सदस्य थे। आइए पढ़ते हैं उनकी कुछ खूबसूरत गज़लें…
1. मत जियो सिर्फ़ अपनी खुशी के लिए
मत जियो सिर्फ़ अपनी खुशी के लिए
कोई सपना बुनो ज़िंदगी के लिए
पोंछ लो दीन दुखियों के आँसू अगर
कुछ नहीं चाहिए बंदगी के लिए
सोने चाँदी की थाली ज़रूरी नहीं
दिल का दीपक बहुत आरती के लिए
जिसके दिल में घृणा का है ज्वालामुखी
वह ज़हर क्यों पिये खुदकुशी के लिए
उब जाएँ ज़ियादा खुशी से न हम
ग़म ज़रूरी है कुछ ज़िंदगी के लिए
सारी दुनिया को जब हमने अपना लिया
कौन बाकी रहा दुश्मनी के लिए
तुम हवा को पकड़ने की ज़िद छोड़ दो
वक्त रुकता नहीं है किसी के लिए
शब्द को आग में ढालना सीखिए
दर्द काफी नहीं शायरी के लिए
सब ग़लतफहमियाँ दूर हो जाएँगी
हँस मिल लो गले दो घड़ी के लिए
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2. आदमी खोखले हैं पूस के बादल की तरह
आदमी खोखले हैं पूस के बादल की तरह
शहर लगते हैं मुझे आज भी जंगल की तरह
हमने सपने थे बुने इंद्रधनुष के जितने
चीथड़े हो गए सब विधवा के आँचल की तरह
जेठ की तपती हुई धूप में श्रम करते हैं जो
तुम उन्हें छाया में ले लो किसी पीपल की तरह
दर्द है जो दिल का अलंकार, कोई भार नहीं
झील में जल की तरह आँख में काजल की तरह
सोने-चाँदी के तराज़ू में न तोलो उसको
प्यार अनमोल सुदामा के है चावल की तरह
जन्म लेती नहीं आकाश से कविता मेरी
फूट पड़ती है स्वयं धरती से कोंपल की तरह
जुल्म की आग में तुम जितना जलाओगे मुझे
मैं तो महकूँगा अधिक उतना ही संदल की तरह
ऐसी दुनिया को उठो, आग लगा दें मिलकर
नारी बिकती हो जहाँ मंदिर की बोतल की तरह
पेट भर जाएगा जब मतलबी यारों का कभी
फेंक देंगे वो तुम्हें कूड़े में पत्तल की तरह
दिल का है रोग, भला ‘हंस’ बताएँ कैसे
लाज होंठों को जकड़ लेती है साँकल की तरह
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3. ज़िंदगी फूस की झोंपड़ी है
ज़िंदगी फूस की झोंपड़ी है
रेत की नींव पर जो खड़ी है
पल दो पल है जगत का तमाशा
जैसे आकाश में फुलझ़ड़ी है
कोई तो राम आए कहीं से
बन के पत्थर अहल्या खड़ी है
सिर छुपाने का बस है ठिकाना
वो महल है कि या झोंपड़ी है
धूप निकलेगी सुख की सुनहरी
दुख का बादल घड़ी दो घड़ी है
यों छलकती है विधवा की आँखें
मानो सावन की कोई झ़ड़ी है
हाथ बेटी के हों कैसे पीले
झोंपड़ी तक तो गिरवी पड़ी है
जिसको कहती है ये दुनिया शादी
दर असल सोने की हथकड़ी है
देश की दुर्दशा कौन सोचे
आजकल सबको अपनी पड़ी है
मुँह से उनके है अमृत टपकता
किंतु विष से भरी खोपड़ी है
विश्व के ‘हंस’ कवियों से पूछो
दर्द की उम्र कितनी बड़ी है
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